पाँच राज्यों के चुनाव नतीजों में कांग्रेस के * पास जश्न मनाने के लिए बहुत कुछ है । राजस्थान और छत्तीसगढ़ में शानदार जीत मिली है , जबकि मध्य प्रदेश में भले ही अंतर कम हो पर स्पष्ट जीत हुई है । तेलंगाना और मिजोरम में पराजय मिली पर वह अनपेक्षित नहीं थी । कुल - मिलाकर मतदाता ने भाजपा को स्पष्ट संदेश दे दिया है कि आपके जाने का वक्त आ गया है । हर कहीं समान थीम थी । साढ़े चार साल की गलत नीतियों से लोगों को परेशानी हुई , हवा - हवाई भाषण और वादे पूरे करने में नाकामी । राजनीतिक बयानबाजी का जमीनी हक़ीकत से कोई मेल नहीं था । किसान संकट में है , युवाओं लिए जॉब नहीं हैं , अर्थव्यवस्था ठप पड़ी है । अच्छे दिन तो कहीं नजर ही नहीं आ रहे हैं । ट्रेड स्पष्ट हैं । मतदाता खोखले वादों और जुमलों से ऊब गया है । यदि लोगों को अहसास हो कि उनके जीवन में सबकुछ ठीक नहीं है । तो आंकड़ों को तोड़ने - मरोड़ने और जीडीपी में हेरफेर करने का कोई अर्थ नहीं है । प्रचार आपको यहीं तक ले जा सकता है । जिन लोगों ने मोदी की वक्तृत्व आधारित सेल्समैनशिप पर भरोसा कर लिया था , उन्हें अहसास हो गया कि उन्होंने खाली पैकेज ले लिया है । वे इसे बार - बार स्वीकार करते नहीं रह सकते ।

•कृषि भूमि है । अदा ( 53 फीसदी ) पदी ग्रामीण जरा मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण मुद्दों प्रदेशों में देखें । राजस्थान की 75 फीसदी आबादी ग्रामीण और आधे से ज्यादा ( 53 फीसदी ) परिवारों के पास कृषि भूमि है । अनुमानित 90 फीसदी को उनकी फसलों पर न्यूनतम समर्थन मूल्य नहीं मिला । जहां कांग्रेस शासित पंजाब ने 84 फीसदी खरीद सुनिश्चित की है , राजस्थान की भाजपा सरकार सिर्फ 4 फीसदी गेहूं की खरीदी कर पाई । मध्यप्रदेश में कृषि में 70 फीसदी श्रमबल लगा है , वहां प्याज और दलहन की कीमतें नीचे गिरीं और कोई 46 फीसदी किसान परिवार कर्ज से जर्जर हैं । नेशनल क्राइम रिकॉर्ड्स ब्यूरो के मुताबिक मध्यप्रदेश में पिछले 16 वर्षों में 21 हजार किसानों ने आत्महत्या की । इस दौरान 14 वर्षों से ज्यादा तो भाजपा ही सत्ता में रही । जहां दो वर्षों में किसानों की आत्महत्या में 10 फीसदी कमी आई है , मध्यप्रदेश में 21 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है । फरवरी 2016 और फरवरी 2017 के बीच राज्य में 1 , 900 से ज्यादा किसान और खेतिहर मजदूरों ने आत्महत्या की है । इसी तरह भाजपा शासन के दौरान छत्तीसगढ़ में 13 हजार किसानों ने आत्महत्या की है ।

•बेरोजगारी एक और प्रमुख मुद्दा था । राजस्थान में कोई 55 फीसदी आबादी 25 साल की उम्र से नीचे है लेकिन , भाजपा सरकार उन्हें रोजगार देने में नाकाम रही । सीएजी के मुताबिक राज्य में 33 लाख युवा बेरोजगार हैं । तरक्की तो केवल वादों के स्तर में ही हुई । पिछले चुनाव में भाजपा ने 15 लाख जॉब निर्मित करने का वादा किया था तो इस बार उसने 50 लाख जॉब देने का वादा किया । चूंकि पार्टी अपने मूल वादे के आसपास नहीं पहुंच पाई तो नए वादे में विश्वसनीयता नहीं रही । सरकार के नेशनल कॅरिअर सर्विसेस विभाग में पंजीकृत राजस्थान से जॉब चाहने वालों की संख्या 8 , 57 , 316 हैं । 31 मार्च 2018 तक राज्य में रोजगार के खाली स्थान 12 , 854 ही थे यानी सिर्फ 1 फीसदी बेरोजगारों को रोजगार मिल सकता था । यदि इसकी बजाय वे मनरेगा की ओर जाते तो वहां भी उनके लिए कोई खुशी नहीं थी । पिछले साल राजस्थान में 77 लाख लोगों को काम चाहिए थे लेकिन , वास्तव में 65 लाख लोगों को ही काम दिया गया । फिर राजस्थान में मनरेगा के तहत सबसे कम मजदूरी दी गई । जहां इसका राष्ट्रीय औसत 169 . 45 रुपए प्रतिदिन है , वहां राज्य में यह 136 . 84 रुपए प्रतिदिन था ।

•मध्य प्रदेश में तो हालत और भी खराब रही । वहां 14 , 1 लाख बेरोजगार युवाओं में से करीब 12 . 90 लाख शिक्षित बेरोजगार । राज्य सरकार में 200 चपरासियों के स्थान खाली थे ( जिसमें 8वीं पास पात्र थे ) तो 1 . 31 लाख आवेदन आए , जिसमें डॉक्टरेट डिग्री वाले 200 और हजारों पोस्ट ग्रेजुएट थे । यह जितना चौंकाने वाला लगता है उतना है नहीं , क्योंकि प्रदेश में शिक्षित बेरोजगारों का प्रतिशत 2015 के 79 . 60 से बढ़कर दिसंबर 2016 85 . 74 फीसदी हो गया । राज्य विधानसभा में दी गई जानकारी के मुताबिक भाजपा शासन के 14 वर्षों में हर साल औसतन सिर्फ 17 , 600 जॉब निर्मित किए गए । इसमें भ्रष्टाचार के मामले खासतौर पर मध्यप्रदेश में व्यापम और नर्मदा पौधारोपण घोटाला और छत्तीसगढ़ में 36 हजार करोड़ रुपए का पीडीएस घोटाला और जोड़ दीजिए । छत्तीसगढ़ में भाजपा शासन के रहते चिट फंड कंपनियों ने 46 हजार से ज्यादा निवेशकों के 343 करोड़ रुपए ज्यादा पैसे लूट लिए और नकारात्मक बातें बढ़ती ही गईं । इतनी नकारात्मकता और दिखाने के लिए बहुत कम सकारात्मकता होने
के कारण भाजपा सरकारों की विश्वनीयता पूरी तरह खत्म हो गई थी । अचरज नहीं कि भाजपा आज इतनी व्यथित है । वोटर ने उसे तीन तलाक दे दिया है । कुछ लोगों के दिमाग में संदेह था कि क्या मतदाता कांग्रेस को विश्वसनीय विकल्प के रूप में देखेंगे । कांग्रेस ने तीनों राज्यों में गुटबाजी की सारी बातों को गलत साबित करते हुए प्रभावी , एकजुट और सुसंगत प्रचार अभियान चलाकर इन लोगों की आशंकाएं दूर कर दीं । राहुल गांधी के ऊर्जावान नेतृत्व और पांचों राज्यों में उनकी 80 आम सभाओं ने उनके नेतृत्व की पहली वर्षगांठ को निर्णायक जीत से रेखांकित किया । उन्होंने जीत को सौम्यता व परिपक्व राजनेता की तरह स्वीकार किया । इसका मतलब है कि वे उस दायित्व की गंभीरता समझते हैं । जहां भाजपा की तीन सरकारों ( और मिजोरम में कांग्रेस के दस साल के शासन के अंत ) ने पुष्टि की है कि भारतीय राजनीति में सत्ताविरोधी रुख एक प्रमुख ताकत है पर तेलंगाना में टीआरएस की सफलता बताती है कि न्यायपूर्ण कल्याणकारी कार्यक्रम और स्थानीय पहचान अब भी कारगर हैं । कोई शक नहीं कि अन्य दलों ने इसे ध्यान में लिया होगा ।

•आत्म संतोष के लिए तो नहीं पर उम्मीद के लिए बहुत जगह है । मतदाता ने संकेत दे दिया है कि वह भाजपा द्वारा उन्हें हलके में लेने से तंग आ गया है । और अब वह कांग्रेस के काफिले में सवार होने को तैयार है । अगले चार माह में कांग्रेस को वह विजन और क्षमता दिखानी होगी ताकि देशभर के मतदाताओं में यह भरोसा कायम हो सके कि पार्टी उन्हें कुछ करके दिखा सकती है । दिसंबर 2018 के परिणाम , मई 2019 के लिए शुभसंकेत हैं ।